Youth Speak

चल धूप को टटोलते हैं

चल धूप को टटोलते हैं,
छांव में बहुत रह लिए,
अब कुछ गरमाते हैं,
अपना नहीं ना सही,
कुछ सोच का ही मिज़ाज तरबड़ाते हैं,
चल धूप को थोड़ा और टटोलते हैं।

परछाई के पीछे निकल आए बड़ी दूर,
हाथ आया ना फल, ना ही बीजंकृत भूर।
बीज अब भी है, बिखरे ही सही,
ज़मीन अपनी ही है, अपनी ना सही।
धरा में एक नया बीज बोते हैं,
ज्ञानीर और आशा की किरण से इसे सींचते हैं,
धरा को अपने बीज में छपे वृक्ष से मिलाते हैं,
अपनी आँखे बंद कर दृष्टि के दरवाज़े खोलते हैं,
चल धूप को थोड़ा और टटोलते हैं।

धूप कड़ी हैं,
लोगों को पसीने की पड़ी हैं,
देख भाई, पसीना तो आना ही हैं,
मेहनत का होगा तो वो रेला, पैसे बन जेब में ही उतरेगा,
वरना यूँही बह जाएगा।
मेरी सुन, हथियार उठा,
अपनी सुन, काम बिठा,
कर कुछ नया की सभी कहे,
वो जो चला, हम भी कुछ अलग चलते हैं,
उसी की तरह हम भी धूप टटोलते हैं।

दिख नहीं रहा कुछ, घना बहुत हैं,
अभाव का अंधेरा यूँही, तना बहुत हैं,
छूटे हैं आज भी काम वही,
छोटे हैं जो, करने नहीं,
बड़े – बड़े तो सभी ख़यालते हैं,
पर महत वही,
जो छोटे से भी मुँह मोड़े नही,
चल,
माथे के कचरे को निकाल साफ़ करते हैं,
सोच को एक नया रंग देते हैं,
दिशा को नया ढंग देते हैं,
खुले हाँथो से सेवा का रस चरघोलते हैं,
धूप को यूँही टटोलते हैं।

आज की उपेक्षा, कल का उपेक्षित समाज खड़ा करेगी,
आज की बेपरवाही, कल की लापरवाही को ही जन्म देगी,
होगा नहीं ऐसा कभी, जो हाथों से काम हो सही,
कहता नहीं मैं, की भटकेंगे नहीं हम,
पर इस नयी सोच के संग, अहूट होंगे नहीं हम,
धूप को टटोलने निकले हैं जो हम,
ज़रूर आन पड़ी तो, सूर्य को भी खींच लाएँगे हम।
ये नहीं तो वो, वो नहीं तो कुछ और,
कुछ और नहीं तो कुछ और, सिलसिला चलता ही रहेगा,
क्योंकि काम बहुत हैं,
और हम भी कुछ अलग किस्म के पागल हैं।
द Carelessly Careful!

 

– Mr. Bhavesh Ostwal

 

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